झुकाव
जब भी देखता हूँ
आँखे बंद करके, तब
एक पीली-सी रोशनी में
दुनिया घूम रही होती है धरती पर
साढ़े तेईस अंश पर झुकी हुई
झुकी हुई दुनिया में सब कुछ
झुका हुआ लगता है ।
वास्तव में झुकी हुई वस्तु, झुकी नहीं होती
क्योंकि झुकते हम हैं
और महसूस कर जाते हैं वस्तु में झुकाव
दरअसल,मस्तिष्क की गुफाओं में झुकाव ही झुकाव हैं
जिसमें पूरी धरती घूम जाती है
कई-कई बार, पूरी गति से
भर जाती है हर चीज में अपना झुकाव
साढ़े तेईस अंशी
तब ठीक उसी पल
गुफाओं से निकल कर झुकाव
कर देता है टेढ़ा
आँखों के सामने खड़ी तलवार को
बीच से
और मेरा सिर बच जाता है
तब फिर, मैं भरा-पूरा मनुष्य बना रहता हूँ
ताकि कर महसूस
धरती का झुकाव, अपने भीतर
फिर लोगों के मुँह से सुनूँगा-
कोई और एक बच गया
अ-मनुष्य होने से ।
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