पत्ती
वह पत्ती है
पत्ती ही है
धरती से निकली पत्ती
पेड़ की मोटी छाल के भीतर से
धरती के जाने किस भाग
किस अंश से बनी
पेड़ की जड़ों में दौड़ती हुई
ऊपर की सबसे ऊँची डाल पर
ताँबे की सी लाल-लाल
चमक रही है
मेरी आँखों ने ढूँढ ही लिया
आखिर में उसे
धरती की पूरी पड़ताल के बाद
अन्नत वर्षों के
अब,अनींद की बिमारी
हो जायेगी ठीक स्वतः
क्योंकि भूख मिट गयी आज
अन्न की तपस्या साधकर
उस पत्ती की ताँबायी कोमलता से
हो जाना चाहता हूँ अँधा
कि कहीं चुभ न जाये कोई काँटा
और खो न जाये कहीं
वह पत्ती.
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