Monday, June 25, 2012

आखिर में

               आखिर में

आखिर में
गिर जाते हैं मंदिर के कंगूरे
मस्जिद के गुम्बद और
गिरजाघर के धरन भी

इनके खन्डहरों में भी
कुछ नहीं बचता साबूत ।
क्योंकि हर ध्वनि की आवृति इतनी तीव्र है कि
बढ़ गया है कम्पन प्रत्येक वस्तु का
टूट रही है पूरी धरती
भरभरा कर भीगे हुए रेत-सी,धीरे-धीरे
फैल चुका है वायुमन्डल में कोई
तीव्रतम सुनामी अज्ञात-सा,चुपचाप

क्या जानवर क्या आदमी सब बदहवास

बस कुछ ही आँखों में तैर रही लोगों के
डरी-डरी-सी जिज्ञासा
होने न होने के आखिरी परिणाम की

बिल्ली के आँखों की खड़ी पुतलियाँ
चित होकर झाँक रही है
अब कुत्ते की आँखों से, और
नेवले की जीभ जितनी सुन्दर है आदमी-सी
आदमी की नहीं रह गयी अब
डँस लिया है सर्प ने मेरे
जीभ पर ही नेवले के

और हिरन की मासूमियत मैंने ही
रख दी है भेड़िए के जबड़ों पर
आखिर में...  

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