अगर कभी हम मिले कहीं जब
हममें तुममें अलग-सा क्या है
जब तुम रोते मैं भी रो देती
हँसते तो हँस देती
पास बुलाती व्याकुलता जब
और तड़प कर तब चुपचाप
आँखों से सम्प्रेषित सम्वेदन
सहलाता दुःख दर्द हमारे
कभी-कभी मैं और कभी तुम
कटते थे सबसे अपने में बँटते थे तब
हममें तुममें अलग-सा क्या है
नहीं रूप और वस्तु कहीं थे
हावी मन पर
एक गहनतम भेदन पर पाया था तुमको
प्राप्त नहीं परिमाण कभी भी
जीवन रहा सदा तप सदृश
यही है सच, तो गलत सा क्या है
आज वरसों बाद पकड़कर मुट्ठी भर आकाश
कहती हूँ कि-होगा पाप ये प्रेम
स्वार्थ और हीनता चरित्र की होगा
माने इसे संसार तो माने
तुमने क्या माना, मुझे बताना सच
अगर कभी हम मिले कहीं जब.
No comments:
Post a Comment