Tuesday, June 26, 2012

गहरी रात

                 गहरी रात

कुछ रातें बहुत गहरी हो जाती हैं
कभी-कभी
जैसे वर्त्तमान,भविष्य से निकलकर
खड़ा हो जाता है
भूत के पृष्ठ पर
कुछ पल के लिए

फिर तुम्हारी आँखें मुझे खोजती हैं
उसी तरह जैसे
भविष्य हावी रहता है
वर्त्तमान की आँखों में
और भूत संघर्ष करता है
पहचान के लिए उन ही आँखों में
अपनी सारी जटिलताओं के साथ

हाँ मैं उन्हीं गहरी-सी रातों में
तब उलझ जाता हूँ
पहुँचने के लिए किसी एक निर्णय पर
ढेर सारे निर्णयों के बीच

और तुम,उसी क्षण आकर
मुस्कुरा देती हो
जाने मेरी याद में या मेरी हताशा में
न जाने कहाँ (भूत,भविष्य,वर्त्तमान)
से निकलकर

और तब बन जाता हूँ
मैं भी
एक गहरी रात....।

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