Monday, June 25, 2012

आज भी

                                        आज भी

सुनो अनु बहुत जिद्दी हो गया हूँ
अब तनिक रुक कर कभी मैं सोचता कुछ भी नहीं
चलता जाता, चलता जाता, चलता जाता
पाँव दुखते झूलता तन थकन से
कसमसाकर, बदन रह जाता तड़पकर
ये थकन मेरी मेरे साथ मिलकर
चल रही है उसी पथ पर
जिसे निर्धारित किया मेरे लिए तुमने
खुशी है कि उस डगर का पथिक तो कोई बना हूँ
जानता हूँ नहीं है मंजिल वहाँ पर
बस व्यथायें हैं
जो तुमने थी बिछायी राह पर
उन व्यथाओं से
मेरा सम्बन्ध गहरा बन गया है
क्योंकि सब कुछ प्रिय है
मुझको तुम्हारा आज भी
और तुम मेरी प्रिया हो ।

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