परींदा
वह जो ऊँची चोटी है
वहाँ छिपा कर रखी गयी
मेरे हिस्से की रोटी है
मरता हूँ जिनभर खटता हूँ
फिर भी भूखा प्यासा रहता हूँ
पाना चाहूँ, हाथ बढ़ाऊँ, छू ना पाऊँ
पैरों में जो बँधी पड़ी है
वह जंजीर तो मोटी है
ये जो पूँजीवाले हैं
छीने मेरे निवाले हैं
उस ईश्वर ने मेरे हाथों पर लिखी
वही तकदीर जो खोटी है
मेरा हिस्सा छीन लिया
मुझसे छीन नहीं खुद खाता
जाने कितने पेट काटकर
अपने बंकर में रखता वह
केवल अपना भाग्य बनाता
दिखा-दिखा सबको ललचता
जिसके तन पर खादी है
उसने छीनी आजादी है
इन सबकी दया पर जिन्दा हूँ मैं
पिंजड़े का परींदा हूँ मैं
फिर जो मुझको मिली जिन्दगी
कहाँ है लम्बी छोटी है.
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