Monday, June 25, 2012

भाग्य

          भाग्य

रात के अन्धेरे में
याद आती है सूरज की रोशनी
जिसमें जुगाड़ की मशक्कत रहती है
भूख के ताप की
अकेलेपन में
मुझे पता है
वह रोशनी कहीं गयी नहीं है
भूख में बदल कर छा गयी है
चारो ओर रात बनकर
उसमें टिमटिमाते तारे
कोशिश में है लगातार
मैं शान्त हो जाऊँ
परन्तु, शक्तिशाली हैं
हाथ की रेखायें
जो स्यवं कुछ करती नहीं
पर मैं भ्रमित हूँ इतना
कि जाल से मुक्त नहीं हो पाता
जिसको बनाता हूँ खुद ही
बचपन से
और कह देता हूँ भाग्य.

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