मैं
बदल गया हूँ मैं
महसूस कर सकता हूँ अपनी सांसों से
धमनियों में दौड़ते हुए खून से भी
धड़कन की गति
अब धड़कन के गति जैसी नहीं रही
बार बार जल रही माँसपेशियों की गंध से
झलक जाता है
मेरे भीतर का अनियन्त्रित बदलाव
पीव की तरह बाहर आ जाती है
रह-रह कर मेरी कुरूपता- आदमीयत की
मैं जैसा बन गया हूँ
लोगो को हँसी आती है
मगर मैं जानता हूँ मेरे देश की जनता
मेरे ही जैसे, अपने भीतर भटक रही है
आधी सोयी आधी जागी
विक्षिप्त और मरी हुई है,जीवित भी है
आधी-आधी,मेरी ही तरह
और मैं ये भी जानता हूँ कि
न मैं मुकद्दर का सिकन्दर हूँ
और न ही सिकन्दर का मुकद्दर
क्योंकि दोनों की हाथों में
कुछ नहीं रहता है अन्त में
ठीक वैसे ही जैसे
सागर में मिलने से पहले गंगा
गंगा- सी नहीं दिखती
और गंगा को समेटने से पूर्व सागर
सागर- सा नहीं रहता
पर दोनों के बीच का वह, नहीं होना दोनों का
मैं हूँ, और मेरा होना अनिवार्य है
जहाँ से एक ओर सागर
दूसरी ओर गंगा है सदियों से
जैसे मेरे देश की जनता और मेरे बीच
मेरा देश..
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