तुम आओगे न
अब तो
बीत गये जाने कितने दिन
दिन नहीं बरस कहूँ तो ठीक होगा
तुम्हें मुझसे दूर हुए
परन्तु आज भी जलती है आशा
सूरज की तरह
कि तुम आओगे
कि तुम आओगे और हवायें खबर देंगी
हवायें खबर देंगी कि उनके मेरे बीच
एक अनुबन्ध है
इसी खातिर खुला रखती हूँ
खिड़कियाँ और झरोखे कि कहीं से भी आ जायें वे
और मुझे बता दें
कि दिख जाओ कहीं से भी तुम
और सच बताऊँ तो आज तक
होता रहा बार-बार यही अहसास कि तुम आये
कि तुम आये
कहीं पत्तों की खरखराहट भी
रोमांचित करती है मुझे कि तुम आये
मगर तुम्हें न पाकर
सूनी आँखें खाली पसरे सन्नाटे में
तुम्हें ढूढतीं हैं दूर तक
और शून्य में बना लेती हैं
तुम्हारा अदृश्य रूप
कभी मैंने अकेलेपन में छुपकर
जो लिखे थे तुमको पत्र
उन्हें मैं पढ़ती हूँ आज भी
तो लगता है कि तुम पास खड़े हो
और उन्हें पढ़ कर तुम्हें सुना रही हूँ
एक-एक शब्द से जी लेती हूँ
कई-कई पल
जी लेती हूँ छूकर तुम्हारा नाम
सूरज और चन्द्रमा के ढाँढस के बावजूद
सो नही पाती हूँ ठीक से
सारी पीड़ा को दबाकर
रो नहीं पाती हूँ ठीक से
रो नहीं पाती हूँ ठीक से
तुमको बता दूँ
समाज और दुनिया के बेड़ियों के बीच
नींद आने का बहाना करना पड़ता है
न चाहकर भी मुस्कुराना पड़ता है
मैं जानती हूँ तुम आओगे
मेरी धड़कन और रूकती साँसों को जीवन देने
तुम आओगे न
सुंदर भावाभिव्यक्ति .......... !!
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