एक सूरज और
भटकते भटकते जब डूब जाता है सूरज
क्षितिज के एक ओर... हर रोज
तब निकलता हूँ मैं
गहरे सन्नाटे में, चुपचाप
अपनी जानी पहचानी एक आवाज के साथ
मेरी बैशाखियों की, रात में
और उसके गहरे अंधेरे में
चमक उठती है मेरी आँखें
करती हैं रोशनी संसार भर में ।
नहीं निकलता कभी
दिन में भूले से भी मैं
क्योंकि बढ़ जाता ताप
मेरे भीतर की आग से
सूरज की और-और
इसीलिए रात में निकलता हूँ
ताकि जल न जाये संसार यह
मेरे भीतर की आग से
रात की गहराई में कम हो जाती तपिश
उस आग की जो जल रही,दुत्कार से
और अपनी लाचार-सी,बेबसी से
पूर्ण नहीं हूँ, अयोग्य हूँ
किसी भी भूमिका में
क्योंकि सुनता हूँ एक शब्द बचपन से
मैं अपंग हूँ
चल नहीं सकता ठीक से
तब क्या कर सकूँगा कुछ भी
तब भड़क उठती और-और
मेरे भीतर की आग
रोक लेता हूँ खुद को
डर जाता हूँ कि दुनिया नष्ट न हो जाय
सोच लेता, यही मेरी नियति शायद
रिसते घावों को पिरा पिरा जाने देना
कर लेना सन्तोष उसी जीवन से
जो सिर्फ रात को ही जीता हूँ
रख छोड़ा जिसे समाज ने ढोने को मुझको
उनके सामने हाथ पसारे- लाचार
पर हार नहीं है मेरे भीतर
देखता हूँ सूर्य में भी अपनी विकलांगता
रात को जो जीता है वह
हाँ हार कैसे मान लूँ
जब हारता नहीं सूरज
रोज लड़ते-लड़ते काली सी रात से
तब जुड़ जाता मैं उससे और
जीत जाता हूँ सबसे- खुद से भी
बाहर-भीतर ।
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