आते बादल घेरे
करते हुए अंधेरे
जीवन की प्यास बुझेगी क्या
कोई नयी आस जगेगी क्या
आँखें
सूख गयी सबकी
धरती उजड़ गयी कबकी
खेतों में फरसे मार-मार के
पीठ जल गयी है कबकी
जली पीठ पर
आग जली है
साँवा घास पकेगी क्या
खेत
पड़े हैं खाली-खाली
भूखे पेट चले ना नाड़ी
क्या बोयें और क्या काटें अब
धक्के देकर चलती गाड़ी
अब तक हुआ नहीं है
कुछ भी
अगली फसल कटेगी क्या
सूख
गये हैं काँटे तक
इस बादल के आने तक
लगता है ये अब बरसेंगे
तब बरसेंगे जाने तक
ये क्या
हवा बही अब भी
केवल आस रहेगी क्या.
No comments:
Post a Comment