Friday, May 6, 2011

एक बार सुनो तो


एक बार सुनो तो

सुनो तो..
टहनियों से जुड़ी पत्तियों पर
सोते थे हजारों हजार सपने, हर तरह के
खो गये हैं
फूलों की पँखुड़ियों पर
रंग-बिरंगे चेहरे के भाव थे
अब बदरंग हो गये हैं
इन्द्रधनुष बनाती हुईं तितलियाँ
अब धनुष के ऊपर-ऊपर
खो जाना चाहतीं हैं, लौटना नहीं
भँवरे जो डर गये हैं
अपना गुँजार ही उन्हें भय देता है
इसीलिए, चुप.. चुप..
सब शान्त-शान्त, भयातुर
कहीं न हो कोई आवाज,
जहाँ पूरा वातावरण सो जाना चाहता है
वहाँ से

और शायद यह कोई मानव है यह जिसकी
अँजुरी में भरा हुआ जल गरमा रहा है
चेहरे की थकन कम करता जो
या हर लेता हृदय की प्यास
गरम-गरम खून से सन चुका है
बन चुका है लावा
हाथ तो जल चुका है मगर भ्रम है
और उसकी
मिचमिचायी आँखों मे भरे हुए कीचड़,
पपड़ी पड़े होठों की दरारों
और सिकुड़े हुए माथे की चमड़ी के बीच से..

आती है घुटी हुई चीख ! सुनो
बस एक बार रुक कर, सुनो तो..
क्योंकि तुमने घोल दिए हैं
बारुदी गंध
पूरे वातावरण में..

No comments:

Post a Comment